Sunday, 22 May 2016

दवा रूठा पड़ा हैं

ग़म तो हर बात से हैं
जो रुला देती हैं
रूठ कर, बेनिंद सुला देती है
समझने - समझाने के चक्कर में
झूठला देती हैं,
ग़म हर बात से है
वादों के टूटने से
बाहों के छूटने से
कभी कुछ लिखने से
कभी कुछ दिखने से,
PC- S. Ranjan Nayak
ग़म ही ग़म है
बात बात में,
जो बातें दिल से जुडी हैं,
पर दवा नहीं है
क्यूंकि दर्द से दर्द जुड़ा है
और दवा रूठा पड़ा है,
दिलवाले दर्द की परवाह में
आह की राह में खड़े हैं
दर्द तो दर्द से जुड़ा है
और दवा रूठा पड़ा है,
दर्द ही दर्द हैं
क्या सर्द क्या गर्म
कुछ सुर्ख तो कुछ नर्म
दर्द ही दर्द हैं
अब दवा दे कौन
ज़र्रे - ज़र्रे में दर्द ए ग़म हैं
और दवा दूँ भी क्या
एक सांस में कितने ग़म हैं
हो सके तो उसको मना लो
कबसे दवा तन्हा रूठा खड़ा हैं
मनाने के आस में पड़ा हैं
दवा रूठा पड़ा हैं.

Sunday, 27 March 2016

जानें कहाँ,,,,,,,,

                  

कभी ये मत  सोंचना की दूर  होने से और बातें  न करने  से
 हम अपने को भूल  जायेंगे ,
जब तक जिन्दा हो और जिंदगी है ,
हम चाह कर भी दूर नहीं हो सकते ,

शायद वो ना जाने क्या  सोंच कर 
मुझसे दूर जाने लगे है ,
पर मै  उनकों  हर मोड़  पर  मिलूंगा
कभी प्यार
तो कभी गुस्सा में ,
कभी गीत
तो  कभी  ग़ज़ल में ,
कभी sms  
तो कभी पन्नों  में,
कभी झूठ
तो कभी संच में ,
कभी आँसु
तो कभी मुस्कान में,

कभी भी और कहीं भी
ऐसा पल या मोड़ मिल जाए 
जिसमे मेरी यादें ना हो ,
तो ये समझ लेना की 
मेरा प्यार बस एक रात का सपना था
और
बिन राज की कहानी थी ,
या फिर
मैं बस वह हवा का झोंका  था 
जो की एक पल के लिये आया 
और तुम्हारी सजीं -सवारी  जुल्फों  को 
उलझा  के चला गया 
जानें  कहां ,,,,,,,,,,,

और देखो तुम्हारी यादों  का असर
मुझ पर यूँ  हुआ है की 
मैं क्या लिखा हूँ ,
गीत  या ग़ज़ल या कहानी कुछ पता नहीं, 

बस चला जा रहा हूँ  ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तेरी यादो के जहां  में ,
बनके बेमोल  हवा 
उड़ा जा रहा हूँ ,जाने कहाँ  ,,,,,
जाने कहाँ  ,,,,,,,,
जाने कहाँ ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

Saturday, 26 March 2016

मुनासिब नहीं था मेरा फैसला

बङे हसरत से आये थे तेरे शहर में 
पर मुनासिब नहीं था मेरा फैसला 
मुकद्दर को क्यूँ हम बदनाम कर दे ,


लोगों से कोई डर नहीं 
लेकिन अफसोस

कि नहीं आता छुपाना ,
पर हम वह नहीं 
जो टूट कर

तेरे गम में डूब जायेंगे 
ढूंढ ही लेंगे जमीन पर ठिकाना ,


बङे हसरत से आये थे तेरे शहर में 
पर मुनासिब नहीं था मेरा फैसला 
मुकद्दर को क्यूँ हम बदनाम कर दे .

Thursday, 10 March 2016

देगा दखल आवारगी के बाद

गुमनामी हवाओं का शोर
खामोशी के साथ,

बदनाम घटाओं का मोङ

गुस्ताखी के साथ,

देगा दखल आवारगी के बाद

जानबूझकर ना तोङ कलियों को
दे गाली ना मटकती गलियों  को,


ना होगा सहन वो सकूं भरा रात
देगा दखल आवारगी के बाद,


यारे ,मटरगश्ती मकसद नहीं
पर अब तक तो यही सही रही,


बन जाएंगे बेङी प्यारे जज्बात
देगा दखल आवारगी के बाद,


गुमनामी हवाओं का शोर खामोशी के साथ
बदनाम घटाओं का मोङ गुस्ताखी के साथ
 देगा दखल आवारगी के बाद.

Sunday, 14 February 2016

रंगीन निशान है मोहब्बत के ऊपर

रंगीन दुनिया में
बिकती मोहब्बत के नाम पर
रंगीन गुङिया
रंगीन फूल
वो फूल
जो महक से परे है,
वो गुङिया
जो चहक से परे है,


पर मोहब्बत के नाम पर
मोहब्बत के नाम हैं सिर्फ़
वरना मोहब्बत को जताने की क्या जरूरत
दिल से प्यार दिखाने की क्या जरूरत,


क्योंकि मोहब्बत कोई जरूरत नहीं है
और जो जरूरत है
वो मोहब्बत नहीं,
मोहब्बत नहीं
जो तब्दील हैं रंगीन लिबासो में
बस फरेब है नशीली साँसों में
पत्थरीली आँखों में,


मोहब्बत तो मिलती
झोपड़ी के रातों में
सब थोङे - थोङे बांट कर
खुश हैं रातों में,


बिना किसी फुल
बिना किसी हुलगुल
दिखता है माँ बेटे का प्यार
पति की पुलकार
बिना कोई दिन
बिना किसी तालमेल के रंगीन
चौक - चौराहे पर रेलों में देखो
पीठ पर बाँधे बिना रिश्ते की बोझ
बाँट रही है
बस प्यार के दो बोल,


पर दुनिया को यकीन नहीं
क्योंकि रंगीन निशान हैं
अब मोहब्बत के ऊपर.

Thursday, 14 January 2016

मोहब्बत में मजा मरने का

जिल्लत की जिंदगी तो जीते हैं सब
नफरत के आग में जलते हैं सब
पर मोहब्बत में मरने का मजा ही कुछ और है,


यूं तो पैग पर पैग लङाते हैं सब
गिर के होश में आते हैं सब
पर दीवानगी का नशा ही कुछ और है
मोहब्बत में मरने का मजा ही कुछ और है,


मरे भी तो क्यों गैरों के हाथ
बने हम क्यों उङती राख
हम पागल हैं,पर बवाली नहीं
नशे में हैं पर मवाली नहीं,


मीरा के अमर राग है
मस्तानी सा अबूझ आग हैं हम
इन दिलवालों की बात ही कुछ और है
जो ना समझे उनकी बात ही कुछ और है
क्योंकि दीवानगी का नशा ही कुछ और है
मोहब्बत में मरने का मजा ही कुछ और है. 

Wednesday, 2 December 2015

‪ग़ालिब से गिला‬


ग़ालिब तेरे प्यार से
भरोसा उठ गया रणवीरा का,

क्योंकि अब शब्द हथियार
प्यार तलवार बन गए हैं
और तेरे ही गजल तकरार बन गए हैं,

किस के काँधे पर
रखे सर को 
क्योंकि वो भी तो शिकार हो गए हैं,


पढकर तुझे

चला मोहब्बत फैलाने
पर लौटा नहीं

लेकर प्रेम लहर
फिर अपने शहर,


क्योंकि वो जोङे पैरों के निशान भी
मुझे पहचानने से इंकार कर गए हैं.