ग़म तो हर बात से हैं
जो रुला देती हैं
रूठ कर, बेनिंद सुला देती है
समझने - समझाने के चक्कर में
झूठला देती हैं,
ग़म हर बात से है
वादों के टूटने से
बाहों के छूटने से
कभी कुछ लिखने से
कभी कुछ दिखने से,
ग़म ही ग़म है
बात बात में,
जो बातें दिल से जुडी हैं,
पर दवा नहीं है
क्यूंकि दर्द से दर्द जुड़ा है
और दवा रूठा पड़ा है,
दिलवाले दर्द की परवाह में
आह की राह में खड़े हैं
दर्द तो दर्द से जुड़ा है
और दवा रूठा पड़ा है,
दर्द ही दर्द हैं
क्या सर्द क्या गर्म
कुछ सुर्ख तो कुछ नर्म
दर्द ही दर्द हैं
अब दवा दे कौन
ज़र्रे - ज़र्रे में दर्द ए ग़म हैं
और दवा दूँ भी क्या
एक सांस में कितने ग़म हैं
हो सके तो उसको मना लो
कबसे दवा तन्हा रूठा खड़ा हैं
मनाने के आस में पड़ा हैं
दवा रूठा पड़ा हैं.
जो रुला देती हैं
रूठ कर, बेनिंद सुला देती है
समझने - समझाने के चक्कर में
झूठला देती हैं,
ग़म हर बात से है
वादों के टूटने से
बाहों के छूटने से
कभी कुछ लिखने से
कभी कुछ दिखने से,
| PC- S. Ranjan Nayak |
बात बात में,
जो बातें दिल से जुडी हैं,
पर दवा नहीं है
क्यूंकि दर्द से दर्द जुड़ा है
और दवा रूठा पड़ा है,
दिलवाले दर्द की परवाह में
आह की राह में खड़े हैं
दर्द तो दर्द से जुड़ा है
और दवा रूठा पड़ा है,
दर्द ही दर्द हैं
क्या सर्द क्या गर्म
कुछ सुर्ख तो कुछ नर्म
दर्द ही दर्द हैं
अब दवा दे कौन
ज़र्रे - ज़र्रे में दर्द ए ग़म हैं
और दवा दूँ भी क्या
एक सांस में कितने ग़म हैं
हो सके तो उसको मना लो
कबसे दवा तन्हा रूठा खड़ा हैं
मनाने के आस में पड़ा हैं
दवा रूठा पड़ा हैं.
