Sunday, 13 September 2015

बेबसी पर हँसी

अपनी बेबसी पर मुझको हंसी आती है
और दर्द दिल से जुड़ती ही जाती है,

होंठों को हँसाऊ
या दिल को मनाऊँ 
मैं अपनी कहानी किससे सुनाऊँ 
काश की कोई मुझे भी पढ़  पाता 
अब अपनी शिकायत कहाँ लिखाऊ, 

दर्द हो या खुशी
नज़र तो उठती ही  हैं 
आंसू गिरे ना गिरे
पलकें झुकती ही हैं 
मन - तन का हाल
छुपाती नहीं है
साँसे तो आती - जाती
पर कुछ बताती नहीं है,

और दर्द तो दिल से जुड़ती ही जाती है
यारों
अपनी बेबसी पर
मुझको हंसी आती है.



No comments:

Post a Comment