अपनी बेबसी पर मुझको हंसी आती है
और दर्द दिल से जुड़ती ही जाती है,
होंठों को हँसाऊ
या दिल को मनाऊँ
या दिल को मनाऊँ
मैं अपनी कहानी किससे सुनाऊँ
काश की कोई मुझे भी पढ़ पाता
अब अपनी शिकायत कहाँ लिखाऊ,
दर्द हो या खुशी
नज़र तो उठती ही हैं
नज़र तो उठती ही हैं
आंसू गिरे ना गिरे
पलकें झुकती ही हैं
पलकें झुकती ही हैं
मन - तन का हाल
छुपाती नहीं है
छुपाती नहीं है
साँसे तो आती - जाती
पर कुछ बताती नहीं है,
पर कुछ बताती नहीं है,
और दर्द तो दिल से जुड़ती ही जाती है
यारों
अपनी बेबसी पर
मुझको हंसी आती है.
अपनी बेबसी पर
मुझको हंसी आती है.
No comments:
Post a Comment